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इधर कई दिनों से समाचार पत्रों में यह खबर छप रही थी। उसे पकड़ने वाले को दिया जाएगा पच्चीस लाख का इनाम । कई हत्यायें,बलत्कार , तस्करी के हैं उस पर इल्जाम । आखिर पकड़ा हींं गया वह पच्चीस लाख के इनाम हुआ इसके नाम । कितना खुश दीख रहा है यह दीखे भी तो क्यों नहीं जान अपनी जोखिम में डाला था इसने फिर पच्चीस लाख की रकम कोई कम नहीं है इसके लिए पूरे देश में इसकी बहादुरी की खबर फैल गई है जंगल में जैसे आग लग गई है। कल इनाम मिलना तय है इसे मगर सारी खुशियाँ इसकी हो गई बेकार । आज अखबार के पहले पृष्ठ पर छपी है पच्चीस लाख के इनामी कैदी पुख्ता इंतजाम के बाद भी फरार ।।          - मुकेश कुमार ठाकुर।
बापू तेरे सपनों का भारत .......................................... देश है आजाद ,देशवासी गुलाम है , नेताओं के हाथ में , भारत की लगाम है, अपनों से ही मतलब इनको, औरो से भला क्या काम है ? अबला नारियों से कर रहे हैं सब शरारत । बापू ! ये है , तेरे सपनों का भारत ।। अहिंसा मिट गई हिंसा की ज्वाला में , सत्य हार गया घोटाला ही घोटाला में , अत्याचारियों के हौसले है बुलंद , बाकी का जीना है कसाला में , इमानदारी लगती है हर जगह नदारद । बापू ! ये है , तेरे सपनों का भारत ।। कल्पना थी तेरी राम राज्य बनाने की , तैयारियां चल रही है यहाँ , रावण को फिर बुलाने की , कोशिश है राम न आ जाए कहीं , इससे पहले सीता को उठाने की , हर सीता सोंच रही है , ये कैसी है कयामत ? बापू ! ये है , तेरे सपनों का भारत ।। यहाँ अपनों में ही होती है लड़ाई , तूने पराये को भी कहना सिखाया था भाई , जाति-धर्म के नाम पर बंट गए , तेरे हिंदू-मुस्लिम, सिख -इसाई , तो क्यों न गिरेगी, भारत -रुपी इमारत । बापू ! ये है , तेरे सपनों का भारत ।। आज है जरुरत भारत को तेरी , कब आएगा तू बोल दे तो सही, ऐसा ध हो कि तुझे आ...
विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी मेरी कविता :- " बेजुबान की व्यथा " किसे कहूँ किसको सुनाऊँ हाल दिल का क्या है ? रो-रो कर मेरी आँखें न जाने कब से गिला है । बेरहम कुल्हाड़ियों की धार जब मेरे दिल पर चलता है । कहता हूँ कसम से आँखों से जल बरसता है । खता क्या है मेरी जो सजा दे रहे हो । मेरे साथ मेरे खानदान का जान क्यों ले रहे हो ? सभ्यता की पहचान तुझसे है ये मानव संस्कृति की पहचान तुझसे है ये मानव पर यह मत भूलो तुम्हारे प्राण मुझमें है ये मानव । जब मैं ही न रहा तुम कैसे रह पाओगे ? जरा सोंचो मुझे मिटाकर भला तुम क्या पाओगे ? तुम्हारे ऊपर तरस मुझे भी आता है । अपना खानदान उजड़ने का दर्द भी सताता है । पर मैं कैसे व्यक्त करूँ भगवान ने तुझे इंसान बनाया है पर हम पेड़ - पौधों को बेजुबान बनाया है ।।
विश्व धूम्रपान निषेध दिवस ( 31मई) पर लिखी मेरी कविता --          " कौन किसे पी रहा है "             ............................. दो अंगुलियों के बीच एक श्वेत दंडिका दबाए जिसके एक छोर पर आग जल रही थी दूसरे छोर को मेरे दोस्त अपने होंठों से दबाए थे । मैंने कहा---    " क्यों इस धूएँ के साथ     अपनी जिंदगी खाक कर रहे हैं ? " दोस्त ने मासुमियत से दिया जवाब --      " आप गलत समझ          रहे हैं शायद ।        हम ठहरे गाँधी जी के अनुयायी        यह विदेशी सिगरेट है        इसलिए इसे जलाकर         राख कर रहे हैं । " आज भी मेरा दोस्त सिगरेट पी रहा है  पर आज तक यह बात मेरी समझ में नहीं आई  "कौन किसे पी रहा है ?? " .....................................
मयखाने आया हूँ मैं ................................ दर्द सीने में छुपाकर हँसी होंठो पे लाया हूँ मैं , झूठी तसल्ली दे ,आँखों को समझाया हूँ मैं । दिल लगाने से पहले दर्द का आभास न था , टूटे दिल लिए हाथों पे प्यार से सहलाया हूँ मैं । दिल भी अब बाजारु असबाब बन गई है यारो , बड़ी मुश्किल से यह सच्चाई आज कह पाया हूँ मैं । दौलत से तौला है 'मुकेश' की मुहब्बत को उसने, साकी तेरे मयखाने यह फरियाद सुनाने आया हू । यूं तो मयपरस्ती की आदत अपनी कभी रही नहीं , गम भुलाने के लिए आज मयखाने आया हूँ मैं ।। ........         ...........          .........        ..........    
माँ ! मुझे आने दो ........................... माँ ! मुझे आने दो माँ ! मुझे मत रोको जिसे खून से अब तक सींचा है तूने जिसके लिए कितनी मन्नतें माँगी है तूने आज उसे ही संसार देखने से पहले मार देना चाहती है तू कैसी निर्दयी हो गई है तू तू तो ममता की मूरत है फिर इतनी कठोर क्यों हो गई है तू । क्या नहीं चाहती तू तेरी गोद मातृत्व सुख से वंचित न रहे कोई तूझे भी माँ - माँ कहे । तू भी तो एक बेटी है माँ । तू भी तो एक बेटी है माँ । जानती हूँ मैं तेरी दर्द भी पहचानती हूँ मैं पर इस पुरुष प्रधान समाज में बेवस हूँ मैं। विचार होते हुए भी विचार शून्य हूँ मैं भाव होते हुए भी भाव शून्य हूँ मैं । पर तेरी क्रंदन ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है । मैं लड़ूँगी इस पुरुष प्रधान समाज से मैं जन्म दूँगी तुझे । मैं जन्म दूँगी तुझे ।।
मजदूर दिवस ......................... मजदूरों का कोई दिवस नहीं होता है साहब ! मजदूर तो केवल विवस होता है साहब !!