विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी मेरी कविता :-
" बेजुबान की व्यथा "
किसे कहूँ किसको सुनाऊँ
हाल दिल का क्या है ?
रो-रो कर मेरी आँखें
न जाने कब से गिला है ।
बेरहम कुल्हाड़ियों की धार
जब मेरे दिल पर चलता है ।
कहता हूँ कसम से
आँखों से जल बरसता है ।
खता क्या है मेरी
जो सजा दे रहे हो ।
मेरे साथ मेरे खानदान का
जान क्यों ले रहे हो ?
सभ्यता की पहचान
तुझसे है ये मानव
संस्कृति की पहचान
तुझसे है ये मानव
पर यह मत भूलो
तुम्हारे प्राण मुझमें है ये मानव ।
जब मैं ही न रहा
तुम कैसे रह पाओगे ?
जरा सोंचो मुझे मिटाकर
भला तुम क्या पाओगे ?
तुम्हारे ऊपर तरस
मुझे भी आता है ।
अपना खानदान उजड़ने का
दर्द भी सताता है ।
पर मैं कैसे व्यक्त करूँ
भगवान ने तुझे इंसान बनाया है
पर हम पेड़ - पौधों को
बेजुबान बनाया है ।।
" बेजुबान की व्यथा "
किसे कहूँ किसको सुनाऊँ
हाल दिल का क्या है ?
रो-रो कर मेरी आँखें
न जाने कब से गिला है ।
बेरहम कुल्हाड़ियों की धार
जब मेरे दिल पर चलता है ।
कहता हूँ कसम से
आँखों से जल बरसता है ।
खता क्या है मेरी
जो सजा दे रहे हो ।
मेरे साथ मेरे खानदान का
जान क्यों ले रहे हो ?
सभ्यता की पहचान
तुझसे है ये मानव
संस्कृति की पहचान
तुझसे है ये मानव
पर यह मत भूलो
तुम्हारे प्राण मुझमें है ये मानव ।
जब मैं ही न रहा
तुम कैसे रह पाओगे ?
जरा सोंचो मुझे मिटाकर
भला तुम क्या पाओगे ?
तुम्हारे ऊपर तरस
मुझे भी आता है ।
अपना खानदान उजड़ने का
दर्द भी सताता है ।
पर मैं कैसे व्यक्त करूँ
भगवान ने तुझे इंसान बनाया है
पर हम पेड़ - पौधों को
बेजुबान बनाया है ।।
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