विश्व धूम्रपान निषेध दिवस ( 31मई) पर लिखी मेरी कविता --
" कौन किसे पी रहा है "
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दो अंगुलियों के बीच
एक श्वेत दंडिका दबाए
जिसके एक छोर पर
आग जल रही थी
दूसरे छोर को मेरे दोस्त
अपने होंठों से दबाए थे ।
मैंने कहा---
" क्यों इस धूएँ के साथ
अपनी जिंदगी खाक कर रहे हैं ? "
दोस्त ने मासुमियत से
दिया जवाब --
" आप गलत समझ
रहे हैं शायद ।
हम ठहरे गाँधी जी के अनुयायी
यह विदेशी सिगरेट है
इसलिए इसे जलाकर
राख कर रहे हैं । "
आज भी मेरा दोस्त
सिगरेट पी रहा है
पर आज तक यह बात
मेरी समझ में नहीं आई
"कौन किसे पी रहा है ?? "
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