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Showing posts from June, 2018
विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी मेरी कविता :- " बेजुबान की व्यथा " किसे कहूँ किसको सुनाऊँ हाल दिल का क्या है ? रो-रो कर मेरी आँखें न जाने कब से गिला है । बेरहम कुल्हाड़ियों की धार जब मेरे दिल पर चलता है । कहता हूँ कसम से आँखों से जल बरसता है । खता क्या है मेरी जो सजा दे रहे हो । मेरे साथ मेरे खानदान का जान क्यों ले रहे हो ? सभ्यता की पहचान तुझसे है ये मानव संस्कृति की पहचान तुझसे है ये मानव पर यह मत भूलो तुम्हारे प्राण मुझमें है ये मानव । जब मैं ही न रहा तुम कैसे रह पाओगे ? जरा सोंचो मुझे मिटाकर भला तुम क्या पाओगे ? तुम्हारे ऊपर तरस मुझे भी आता है । अपना खानदान उजड़ने का दर्द भी सताता है । पर मैं कैसे व्यक्त करूँ भगवान ने तुझे इंसान बनाया है पर हम पेड़ - पौधों को बेजुबान बनाया है ।।
विश्व धूम्रपान निषेध दिवस ( 31मई) पर लिखी मेरी कविता --          " कौन किसे पी रहा है "             ............................. दो अंगुलियों के बीच एक श्वेत दंडिका दबाए जिसके एक छोर पर आग जल रही थी दूसरे छोर को मेरे दोस्त अपने होंठों से दबाए थे । मैंने कहा---    " क्यों इस धूएँ के साथ     अपनी जिंदगी खाक कर रहे हैं ? " दोस्त ने मासुमियत से दिया जवाब --      " आप गलत समझ          रहे हैं शायद ।        हम ठहरे गाँधी जी के अनुयायी        यह विदेशी सिगरेट है        इसलिए इसे जलाकर         राख कर रहे हैं । " आज भी मेरा दोस्त सिगरेट पी रहा है  पर आज तक यह बात मेरी समझ में नहीं आई  "कौन किसे पी रहा है ?? " .....................................