विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी मेरी कविता :- " बेजुबान की व्यथा " किसे कहूँ किसको सुनाऊँ हाल दिल का क्या है ? रो-रो कर मेरी आँखें न जाने कब से गिला है । बेरहम कुल्हाड़ियों की धार जब मेरे दिल पर चलता है । कहता हूँ कसम से आँखों से जल बरसता है । खता क्या है मेरी जो सजा दे रहे हो । मेरे साथ मेरे खानदान का जान क्यों ले रहे हो ? सभ्यता की पहचान तुझसे है ये मानव संस्कृति की पहचान तुझसे है ये मानव पर यह मत भूलो तुम्हारे प्राण मुझमें है ये मानव । जब मैं ही न रहा तुम कैसे रह पाओगे ? जरा सोंचो मुझे मिटाकर भला तुम क्या पाओगे ? तुम्हारे ऊपर तरस मुझे भी आता है । अपना खानदान उजड़ने का दर्द भी सताता है । पर मैं कैसे व्यक्त करूँ भगवान ने तुझे इंसान बनाया है पर हम पेड़ - पौधों को बेजुबान बनाया है ।।
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विश्व धूम्रपान निषेध दिवस ( 31मई) पर लिखी मेरी कविता -- " कौन किसे पी रहा है " ............................. दो अंगुलियों के बीच एक श्वेत दंडिका दबाए जिसके एक छोर पर आग जल रही थी दूसरे छोर को मेरे दोस्त अपने होंठों से दबाए थे । मैंने कहा--- " क्यों इस धूएँ के साथ अपनी जिंदगी खाक कर रहे हैं ? " दोस्त ने मासुमियत से दिया जवाब -- " आप गलत समझ रहे हैं शायद । हम ठहरे गाँधी जी के अनुयायी यह विदेशी सिगरेट है इसलिए इसे जलाकर राख कर रहे हैं । " आज भी मेरा दोस्त सिगरेट पी रहा है पर आज तक यह बात मेरी समझ में नहीं आई "कौन किसे पी रहा है ?? " .....................................