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Showing posts from May, 2018
मयखाने आया हूँ मैं ................................ दर्द सीने में छुपाकर हँसी होंठो पे लाया हूँ मैं , झूठी तसल्ली दे ,आँखों को समझाया हूँ मैं । दिल लगाने से पहले दर्द का आभास न था , टूटे दिल लिए हाथों पे प्यार से सहलाया हूँ मैं । दिल भी अब बाजारु असबाब बन गई है यारो , बड़ी मुश्किल से यह सच्चाई आज कह पाया हूँ मैं । दौलत से तौला है 'मुकेश' की मुहब्बत को उसने, साकी तेरे मयखाने यह फरियाद सुनाने आया हू । यूं तो मयपरस्ती की आदत अपनी कभी रही नहीं , गम भुलाने के लिए आज मयखाने आया हूँ मैं ।। ........         ...........          .........        ..........    
माँ ! मुझे आने दो ........................... माँ ! मुझे आने दो माँ ! मुझे मत रोको जिसे खून से अब तक सींचा है तूने जिसके लिए कितनी मन्नतें माँगी है तूने आज उसे ही संसार देखने से पहले मार देना चाहती है तू कैसी निर्दयी हो गई है तू तू तो ममता की मूरत है फिर इतनी कठोर क्यों हो गई है तू । क्या नहीं चाहती तू तेरी गोद मातृत्व सुख से वंचित न रहे कोई तूझे भी माँ - माँ कहे । तू भी तो एक बेटी है माँ । तू भी तो एक बेटी है माँ । जानती हूँ मैं तेरी दर्द भी पहचानती हूँ मैं पर इस पुरुष प्रधान समाज में बेवस हूँ मैं। विचार होते हुए भी विचार शून्य हूँ मैं भाव होते हुए भी भाव शून्य हूँ मैं । पर तेरी क्रंदन ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है । मैं लड़ूँगी इस पुरुष प्रधान समाज से मैं जन्म दूँगी तुझे । मैं जन्म दूँगी तुझे ।।